बंगाली समुदाय से आने वाले भाजपा विधायक शिलादित्य देव ने भी इस मुद्दे
पर काफी 'उत्तेजक' बयान दिए हैं जिसके चलते राज्य के कई थानों में उनके
खिलाफ मामले दर्ज हुए हैं. उधर केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहे
कुछ पूर्व उल्फाई नेताओं ने भी 'धमकी' भरे अंदाज में अपनी प्रतिक्रियाएं दी.
ऐसे आरोप है कि जब प्रदेश में असमिया-बंगाली के बीच आपसी टकराव का एक माहौल बन रहा था उस समय राज्य सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठाए.
बंगाली मूल के पांच लोगों की हत्या के दो दिन बाद शनिवार को मुख्यमंत्री सोनोवाल ने कहा कि प्रदेश के माहौल को भड़काऊ बयानबाजी से खराब करने वाले सभी पक्षों के खिलाफ उनकी सरकार कानूनी कार्रवाई करेगी.
इस बीच वार्ता समर्थक पूर्व उल्फा नेता मृणाल हजारिका और जीतेन दत्त को उनके कथित 'धमकी' वाले बयान के लिए गिरफ्तार किया गया है. पुलिस का कहना है कि पूर्व उल्फा नेताओं ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक का समर्थन करने वाले हिंदू बंगाली लोगों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी.
राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आल ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के महासचिव लूरिन ज्योति गोगोई ने कहा,"प्रदेश की सरकार अपना राजधर्म निभाने में पूरी तरह विफल रही है."
आसू वही छात्र संगठन है जिसका नेतृत्व करते हुए सर्वानंद सोनोवाल ने एक नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई और इसी पहचान ने उन्हे राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया.
असम में जातीय अस्मिता को लेकर हिंदू बंगालियों और असमिया लोगों के बीच टकराव का पूराना इतिहास रहा है.
पचास के दशक से ही गैर-कानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन साल 1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया और इसके खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के नेतूत्व में व्यापक स्तर पर आंदोलन छेड़ा गया.
करीब छह साल चले इस आंदोलन में सैकड़ो लोग मारे गए. आखिर में 1985 में तत्कालिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आसू नेताओं के साथ असम समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते में साफ तौर पर उल्लेख किया गया कि 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से असम में आए लोगों की शिनाख्त कर उन्हें यहां से बाहर निकाला जाएगा. फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान. असम समझौते के 33 साल बाद सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी यहां नए सिरे से बन रही है.
इस बीच केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों से भारत आने वाले धार्मिक अल्पसंख्यक आप्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन बिल को संसद में पेश कर एक तरह से एनआरसी की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. असमिया लोगों का तर्क है कि सैकड़ो लोगों के बलिदान के फलस्वरूप सालों बाद एनआरसी का काम शुरू हुआ है और सरकार अब नागरिकता संशोधन बिल के जरिए बांग्लादेशी हिंदू बंगालियों को यहां बसाना चाहती है. अगर ऐसा हुआ तो असमिया जाति का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा.
उल्फा (आई) की गतिविधियों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का दावा है कि राज्य में जब भी असमिया जाती की भावनाओं से जुड़ा कोई मुद्दा गरमाता है तो उल्फा का परेश बरुआ गुट उसका फायदा उठाने के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम देता है ताकि संगठन के प्रति लोगों का समर्थन हासिल कर सकें.
वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ गोस्वामी कहते हैं,"असम के लोग उल्फा या परेश बरुआ के प्रति किसी तरह का समर्थन नहीं करते." हालांकि तिनसुकिया जिले में जहां बंगाली मूल के लोगों की हत्या की गई है, वो परेश बरुवा का गृह जिला है और वहां एक-दो गांव में उल्फा का थोड़ा असर है.
गांव में सुरक्षा बलों के साथ गश्त लगाने आए एक पुलिस अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि ये काम उल्फा के परेश बरुवा गुट के लड़कों का ही है. सदिया इलाके में उल्फा (आई) के कुछ कैडर सक्रिय है. पुलिस लगातार इन कैडरों को तलाश रही है लेकिन इन कैडरों के लिए यहां किसी भी घटना को अंजाम देकर अरुणाचल प्रदेश के रास्ते म्यामांर भागना काफी आसान है.
अपने छोटे भाई सुबल दास को खो चुके 65 साल के सुनिल दास कहते है,"हमारे गांव में कभी ऐसी घटना नहीं हुई. इस इलाके में ये एकमात्र बंगाली बहुल गांव है लेकिन असम आंदोलन के समय भी यहां एक भी घटना नहीं हुई."
सुबल दास की छह बेटियां है. तीन की शादी हो गई और तीन घर पर है. उनकी 15 साल की छोटी बेटी सुमोति रोते हुए कहती है, "मेरे पिता अगर उस दिन ठेला वापस करने नहीं जाते तो आज जिंदा होते."
फायरिंग की घटना में मारे गए 18 साल के धनंजय की मां को रो रो कर बुरा हाल हो गया है. बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव में अधिकतर लोग आपस में रिश्तेदार हैं.
वे इस घटना से न केवल सदमे में है बल्कि काफी डरे हुए हैं. सरकार ने गांव की सुरक्षा के लिए मोहनलाल के घर के सामने सुरक्षा बलों का एक अस्थाई कैंप बनवाया है, जहां असम पुलिस के जवानों के साथ सीआरपीएफ की एक प्लाटून 24 घंटे गांव की सुरक्षा के लिए तैनात रहेंगे.
लेकिन इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में उत्पन्न हुए माहौल को अभी सामान्य होने में थोड़ा वक्त लगेगा.
ऐसे आरोप है कि जब प्रदेश में असमिया-बंगाली के बीच आपसी टकराव का एक माहौल बन रहा था उस समय राज्य सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठाए.
बंगाली मूल के पांच लोगों की हत्या के दो दिन बाद शनिवार को मुख्यमंत्री सोनोवाल ने कहा कि प्रदेश के माहौल को भड़काऊ बयानबाजी से खराब करने वाले सभी पक्षों के खिलाफ उनकी सरकार कानूनी कार्रवाई करेगी.
इस बीच वार्ता समर्थक पूर्व उल्फा नेता मृणाल हजारिका और जीतेन दत्त को उनके कथित 'धमकी' वाले बयान के लिए गिरफ्तार किया गया है. पुलिस का कहना है कि पूर्व उल्फा नेताओं ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक का समर्थन करने वाले हिंदू बंगाली लोगों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी.
राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आल ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के महासचिव लूरिन ज्योति गोगोई ने कहा,"प्रदेश की सरकार अपना राजधर्म निभाने में पूरी तरह विफल रही है."
आसू वही छात्र संगठन है जिसका नेतृत्व करते हुए सर्वानंद सोनोवाल ने एक नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई और इसी पहचान ने उन्हे राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया.
असम में जातीय अस्मिता को लेकर हिंदू बंगालियों और असमिया लोगों के बीच टकराव का पूराना इतिहास रहा है.
पचास के दशक से ही गैर-कानूनी रूप से बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन साल 1979 में यह एक प्रमुख मुद्दे के रूप में सामने आया और इसके खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के नेतूत्व में व्यापक स्तर पर आंदोलन छेड़ा गया.
करीब छह साल चले इस आंदोलन में सैकड़ो लोग मारे गए. आखिर में 1985 में तत्कालिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आसू नेताओं के साथ असम समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते में साफ तौर पर उल्लेख किया गया कि 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से असम में आए लोगों की शिनाख्त कर उन्हें यहां से बाहर निकाला जाएगा. फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान. असम समझौते के 33 साल बाद सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी यहां नए सिरे से बन रही है.
इस बीच केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों से भारत आने वाले धार्मिक अल्पसंख्यक आप्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन बिल को संसद में पेश कर एक तरह से एनआरसी की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. असमिया लोगों का तर्क है कि सैकड़ो लोगों के बलिदान के फलस्वरूप सालों बाद एनआरसी का काम शुरू हुआ है और सरकार अब नागरिकता संशोधन बिल के जरिए बांग्लादेशी हिंदू बंगालियों को यहां बसाना चाहती है. अगर ऐसा हुआ तो असमिया जाति का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा.
उल्फा (आई) की गतिविधियों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का दावा है कि राज्य में जब भी असमिया जाती की भावनाओं से जुड़ा कोई मुद्दा गरमाता है तो उल्फा का परेश बरुआ गुट उसका फायदा उठाने के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम देता है ताकि संगठन के प्रति लोगों का समर्थन हासिल कर सकें.
वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ गोस्वामी कहते हैं,"असम के लोग उल्फा या परेश बरुआ के प्रति किसी तरह का समर्थन नहीं करते." हालांकि तिनसुकिया जिले में जहां बंगाली मूल के लोगों की हत्या की गई है, वो परेश बरुवा का गृह जिला है और वहां एक-दो गांव में उल्फा का थोड़ा असर है.
गांव में सुरक्षा बलों के साथ गश्त लगाने आए एक पुलिस अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि ये काम उल्फा के परेश बरुवा गुट के लड़कों का ही है. सदिया इलाके में उल्फा (आई) के कुछ कैडर सक्रिय है. पुलिस लगातार इन कैडरों को तलाश रही है लेकिन इन कैडरों के लिए यहां किसी भी घटना को अंजाम देकर अरुणाचल प्रदेश के रास्ते म्यामांर भागना काफी आसान है.
अपने छोटे भाई सुबल दास को खो चुके 65 साल के सुनिल दास कहते है,"हमारे गांव में कभी ऐसी घटना नहीं हुई. इस इलाके में ये एकमात्र बंगाली बहुल गांव है लेकिन असम आंदोलन के समय भी यहां एक भी घटना नहीं हुई."
सुबल दास की छह बेटियां है. तीन की शादी हो गई और तीन घर पर है. उनकी 15 साल की छोटी बेटी सुमोति रोते हुए कहती है, "मेरे पिता अगर उस दिन ठेला वापस करने नहीं जाते तो आज जिंदा होते."
फायरिंग की घटना में मारे गए 18 साल के धनंजय की मां को रो रो कर बुरा हाल हो गया है. बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव में अधिकतर लोग आपस में रिश्तेदार हैं.
वे इस घटना से न केवल सदमे में है बल्कि काफी डरे हुए हैं. सरकार ने गांव की सुरक्षा के लिए मोहनलाल के घर के सामने सुरक्षा बलों का एक अस्थाई कैंप बनवाया है, जहां असम पुलिस के जवानों के साथ सीआरपीएफ की एक प्लाटून 24 घंटे गांव की सुरक्षा के लिए तैनात रहेंगे.
लेकिन इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में उत्पन्न हुए माहौल को अभी सामान्य होने में थोड़ा वक्त लगेगा.
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