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ब्लॉग: क्या आपको भी किसी टीचर से मोहब्बत हुई थी?

शिफ़ॉन की झीनी साड़ी, रंग चटक लाल. स्लीवलेस ब्लाउज़, गला आगे से भी गहरा पीछे से भी. खुले बाल हवा में उड़ते हुए और खुला पल्ला कंधे से गिरता हुआ.
मैंने आंखें बंद की, दिमाग के घोड़े दौड़ाए और अपने स्कूल-कॉलेज की हर उम्र की टीचर को याद किया. पर कोई भी 2004 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'मैं हूं ना' की लाल साड़ी वाली टीचर चांदनी के इस रूप में फ़िट नहीं हुईं.
कॉटन की साड़ी, सेफ़्टी पिन से टिका पल्ला और सिमटे बालों वाली टीचर से आगे तो कल्पना भी जाने का साहस नहीं कर रही थी.
शायद मैं मर्द होती तो कल्पना की उड़ान कुछ और होती. या शायद नहीं.
स्कूल-कॉलेज में टीचर मर्द भी होते हैं पर बॉलीवुड ने उनके किरदार को इतना सेक्सी कभी नहीं दिखाया. मैं हूं ना' के तीन साल बाद रिलीज़ हुई फ़िल्म 'तारे ज़मीन पर' के निकुम्ब सर स्मार्ट थे पर सेक्सी नहीं. ना उनकी शर्ट के ऊपर के बटन खुले थे ना कभी अधखुली आंखों से उन्होंने किसी टीचर या छात्र को देखा था.
पर क्या टीचर थे वो! उनके लिए मन में हर तरह की भावना आई.
लगा कि उनकी गोद में सर रख दो तो हर परेशानी दूर हो जाएगी, कि वो गले लगा लें तो मन का दर्द कम हो जाएगा और अगर उनसे दोस्ती हो जाए तो दिल की हर बात बता दूंगी.
शर्म नहीं आएगी, क्योंकि वो समझेंगे, मेरी नादानी को भी, लड़कपन को भी.
टीचर की ओर प्यार की कल्पना बेशक़ होती है. स्कूल के छात्रों की उम्र के साथ इस कल्पना का और रंगीन होना भी एकदम सहज है.
लेकिन पिछले दशकों में बॉलीवुड की औरतों के शरीर पर रहनेवाली पैनी नज़र से अलग, असल ज़िंदगी में ये कल्पना, कपड़ों, उघाड़ शरीर या शृंगार की मोहताज नहीं होती है.
सयाने होते मन की बेचैनी हो, मां-बाप से ना खुल पाने की वजह से एक बड़ी उम्र के दोस्त की ज़रूरत या वैसा ही स्मार्ट बनने की चाहत.
कई वजहें होती हैं जो पढ़ाई के अलावा भी छात्र के मन में टीचर के लिए उथलपुथल पैदा करती है.
पिछले साल अमरीका के नेवाडा विश्वविद्यालय में 131 छात्रों के साथ एक शोध कर ये जानने की कोशिश की गई कि टीचर्स के आकर्षक होने का स्कूली छात्रों पर क्या असर पड़ता है.
शोध ने पाया कि ज़्यादा आकर्षक टीचर्स का पढ़ाया गया पाठ छात्रों को ज़्यादा समझ आया. लेकिन ये आकर्षण 'सेक्शुअल' नहीं माना गया.
शोधकर्ताओं के मुताबिक़ छात्रों को पाठ बेहतर इसलिए समझ आया क्योंकि 'आकर्षक' टीचर की वजह से उनमें दिलचस्पी ज़्यादा थी और उनकी बात पर ध्यान भी ज़्यादा दे रहे थे.
टीचर की ओर आकर्षण स्वाभाविक है, बस उसकी परिभाषा और दायरा अलग हो सकता है.
अक़्सर उसकी ज़िंदगी सिर्फ़ दोस्तों के साथ होनेवाली बातों और चुटकुलों में होती है. कभी उससे ज़्यादा हो तो फ़ैंटेसी या सपने का रूप ले सकती है.
और उसके आगे हद पार ना हो तो ही अच्छा है. कई देशों में ये ग़ैर-क़ानूनी है.
ब्रिटेन में अगर एक टीचर, या कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे नाबालिग बच्चे की ज़िम्मेदारी दी गई हो, उस बच्चे के साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश करता है तो उन्हें सात साल की जेल हो सकती है.
ये माना जाता है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे यौन संबंध के लिए सहमति नहीं दे सकते.
भारत में भी पॉक्सो ऐक्ट 2012 के तहत नाबालिग बच्चे के साथ किसी भी तरह का यौन संबंध बनाने पर कम से कम सात साल की सज़ा हो सकती है.
क़ानून में अधिकतम उम्रक़ैद की सज़ा का प्रावधान है.
आकर्षण का ये मसला स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं है. कॉलेज में इसकी संभावना और बढ़ जाती है.
अब छात्र वयस्क हो चुका है और साधारण, सहज सा लगनेवाला ये आकर्षण सहमति से बने एक संजीदा रिश्ते का रूप ले सकता है.
सब तरह के रिश्तों और पसंद के बारे में उदारवादी होती सोच के बीच, छात्र और टीचर के रिश्ते को लेकर दुनिया में अब भी घबराहट है.
साल 2015 में अमरीका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने अंडरग्रैजुएट छात्रों और टीचर के बीच रोमांटिक या यौन संबंध पर पूरी पाबंदी लागू कर दी.
हार्वर्ड ने कहा कि उनके नियम के मुताबिक "अगर कोई टीचर पढ़ा रहा है, नंबर और ग्रेड दे रहा है तो उन्हें उस छात्र से प्रेम संबंध बनाने की अनुमति नहीं है."
ये फ़ैसला अमरीका के कई और विश्वविद्यालयों में भी लिया गया है. अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ़ यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर्स' ऐसी पाबंदी की वकालत तो नहीं करता पर कहता है कि, "ऐसे रिश्तों में शोषण होने की संभावना बढ़ जाती है".
भारत के विश्वविद्यालयों में ऐसी तय पाबंदी या नियम नहीं है पर इसका मतलब ये कतई नहीं कि इसे किसी तरह की स्वीकृति मिली हो.
युवा होते छात्र की अपने टीचर के प्रति भावनाओं की कल्पना और हक़ीक़त का सफ़र पेचीदा ज़रूर है पर हल्का या उथला नहीं.
बॉलीवुड में दिखाई जानेवाली महिला टीचर से अलग हैं हमारे टीचर्स और उनके लिए मन में उठनेवाले भाव आंखों से टपकनेवाली चाहत से कहीं गहरे.

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